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Hymn No. 3023 | Date: 31-Jan-2006
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यों ही, यों ही न जाने कब तक जिऊँगा जिंदगी।
यों ही, यों ही न जाने कब तक जिऊँगा जिंदगी।
तेरे पास आ आके, अब तक क्यों हूँ दूर मैं तुझसे।
चाहत है बहुत कुछ करने की, तेरा बनके जीने की।
एक लम्हा दो लम्हा चला जाऊँ दूर तेरे पास रहते रहते।
तड़प उठता हूँ जो तेरी याद आये, उस पल दौड़ता हूँ ओर तेरी।
सब कुछ जानते समझते क्यों गंवाता हूँ जिंदगी को।
ऐसा कुछ भी न है जो तूने न दिया, या न देने वाला है।
फिर क्यों नही कर पाया तेरा चाहा हुआ आज तक मैं।
जानता हूँ कमी न है कोई तेरी ओर से, कमी तो है कर्मों में मेरे।
लोग तो उंगली पकड़ के चलते हैं, हमे तो गोद में तूने उठाया।
फिर क्यों तेरे गोद से हूँ उतरता, क्यों हूँ दूर तुझसे हो जाता।
तेरे साथ रहते रहते क्यों नहीं तुझमें खों जाता हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह