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Hymn No. 3024 | Date: 31-Jan-2006
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तेरी यादों से निकल नहीं पाता हूँ, न जाने कब खो जाता हूँ।
तेरी यादों से निकल नहीं पाता हूँ, न जाने कब खो जाता हूँ।
बरबस आँखें नम हो जाती है, जो तुझको चाहके भी जी नहीं पाता हूँ।
डर लगता नही है अब कुछ से, बेताबी भी न है मरने की।
डरता हूँ तो तुझसे बिछुड़ने को, तेरा चाहा हूआ न करने को।
आते जाते लम्हों में कुछ भी न है मेरे पास संजोने के वास्ते।
जिस डगर पे चला हूँ, वहाँ से होता जाऊँ दूर, जो कहलाते थे अपने।
अब तो ख्वाबों में न सोचता हूँ, न ही है कोई ख्वाब सिवाय तेरे।
आवारा मन भटके जहां मैं सारे, पर हर बार लौट के पास तेरे आये।
करता हूँ मिन्नत एक ही बार, फिर से आ जाये तू मेरे पास।
छूटने से पहले छोड़ दूंगा दुनिया को, तेरा हमदम हो जाने के वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह