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Hymn No. 34 | Date: 17-Sep-1996
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ईश्वर है परमप्रभु परमेश्वर, मैं तुझे हर रूप में भजनां चाहता हूँ
ईश्वर है परमप्रभु परमेश्वर, मैं तुझे हर रूप में भजनां चाहता हूँ
तुझे हर रूप में पाना चाहता हूँ, अपने एकांत क्षणों में
या जब में भीड़ के बीच अकेला रहता हूँ, शोर शराबे के बीच
तट्स्थ मन से, बिना किसी अंतरद्वंद के तुझे याद करना चाहता हूँ ।
मैं न कर्म तुझे पाने के लिये, न याद करने के लिये करना चाहता हूँ,
बस करना है इसलिये करता हूँ करता रहना चाहता हूँ
जाने – अंजाने पूर्व के मेरे पापों को इस तन पर भोगना चाहता हूँ ।
तुझे याद करने से मैं फल की आकांक्षा से उबर जाता हूँ
तेरी इच्छा से प्राप्त हुये फल जो मेरे लिये दुःख भरे हों या खुशी
जो होता है वह अच्छे के लिये होता है, इस भाव से लेना चाहता हूँ
हर वक्त तुझे अपने – बेजान से शब्दों के द्वारा बाँधना चाहता हूँ
बिन प्रीत के तुझको याद करना चाहता हूँ, दोष अपनी किस्मत का नहीं देता,
पर जन्मजात सांस्कारिक गुणों का अपने में सर्वदा अभाव पाता हूँ ।
सहज सामान्य मानवीय रिश्ते – नातों का अभाव –
भाव और प्रीत, करूणा से रिक्त यह हाड माँस का शरीर,
और बेचैन मन हृदय का बोध न होना, इनके द्वारा –
तेरे अस्तित्व को खोजना चाहता, हूँ तेरे चरणों में शरण पाना चाहता हूँ ।
अहंकारी, बेबस, असहाय, बेचैन अवगुणों की खान –
अस्तित्ववान हो कर भी अस्तित्वहीन मैं तुझको भजना चाहता हूँ।
- डॉ.संतोष सिंह
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