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Hymn No. 364 | Date: 17-Sep-1998
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इस जीवन का एक – एक पल तेरा दिया हुआ है ।
इस जीवन का एक – एक पल तेरा दिया हुआ है ।
कई - कई बार तूने अंधेरी रातों से उतारा है हमें ।
हमनें दूर किया होगा तूझे अपने मन से ।
ऐं दयालु पिता तूने जाने – अंजाने में भी दूर जाने ना दीया हमें अपने पास।
लोभी है हम लोभ के चलते तेरे पास आते है हम ।
बुझता है सब कूछ फिर भी तेरे घर कें पे आनें देता है हमें ।
झूठा है मेरा मन, मैं खूद भी हूँ झूठा, पर मेरे गीत हें सच्चे जो अपने है ।
मेरी हालत का ना है पता मुझे, पर तडप उठता हूँ तेरे लिये कभी – कभी कुछ पलों के लिये ।
याचना करता हूँ तुझसे, सामर्थ्य नहीं है मुझमें सदीयों पुरानी पैरों में पड़ाr बेड़ीयाँ तोड़ने की।
अधिकार मेरा ना है खुदपे, दया का ना हूँ पात्र में, तेरी हर मंजुरी को सर माथें पे हूँ रखता।


- डॉ.संतोष सिंह