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Hymn No. 365 | Date: 18-Sep-1998
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तम का अंधेरा निखरा हुआ हें, हमारे भीतर और बाहर,
तम का अंधेरा निखरा हुआ हें, हमारे भीतर और बाहर,
भाव में बहतें हुये, ज्ञान की कीरनों के संग हम बढे तेरी ओर,
जीना सीखा दें माया के जग में, जैसे घृत जल में रहके रहता है अलग ।
दुनिया का संग निभातें हुये, स्मरण करतें रहे तेरा पल – पल,
देनें को तू देता है बहुत कुछ, पात्रता ना है हमारी लेनें की,
जो तू चाहता है हमसे, उस कार्य को पुरा नहीं कर पातें है हम,
लत लगा रखी है हमने अनेक, एक भी नहीं है नेक,
कीतना कृपालु है तू जानता सब कुछ फिर भी करता है कृपा हमपे,
तू ही उबार सकता है जिस लायक तू है समझता तू ही बना सकता,
हम तो याचक एwसे है, जिसे याचना भी करनें नहीं आती ढंग से ।
- डॉ.संतोष सिंह
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