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Hymn No. 366 | Date: 18-Sep-1998
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समझ ना है मुझे रत्ती भर की, लापरवाह बहुत मैं,
समझ ना है मुझे रत्ती भर की, लापरवाह बहुत मैं,
लें देकें करता हूँ मैं तेरी परवाह, कभी प्यार से कभी डरकें,
बहुत बार मरा हूँ, तूने अनुभव दियें अनेक,
कई बार तेरे जनदीक पहुंचते – पहुचंते पहुंच गया तुझसे में दूर,
इतना सब कूछ सहा होता तेरे वास्ते,
ऐं खुदा कब का पहुंच गया होता तेरे पास,
मिटा मैं कई - कई बार पर मिटा ना मैं,
मैं से चिपका रहा, हाथ आया था जो तू तुझसे भी हाथ धोया,
रोंया करता हूँ अपनी हालत पे नामर्दों की तरह,
छोडा दें तू मेरा रोना, चल पडुं हंसके जीवन पथ पे तेरी और ।


- डॉ.संतोष सिंह