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Hymn No. 395 | Date: 04-Oct-1998
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कभी – कभी अतिशय पागल हो जाता हुँ तेरे लिये,
कभी – कभी अतिशय पागल हो जाता हुँ तेरे लिये,
दीवानगी का आलम बडता जाता है जब,
कुछ कहनें के वास्तें मुख खोलता हूँ तो,
मेरे शब्द गुम हो जातें है, मैं मुक होके देखता रहता हूँ तूझे ।
आँखे पथरा सी जाती हें, होश रहके बेहोश सा रहता हूं,
उस पल तू ही तू रहता है, मेरे भीतर और बाहर।
कैसा अजीबों – गरीब रिश्ता है तेरा – मेरा,
सब कूछ तू है हमारा, नाम दें ना सकतें है इस रिश्तें को।
तेरे वास्ते क्या – क्या कर सकता हूँ, ये ना है मुझे पता,
पर तूझपे अर्पण कर सकता हूँ अपने आपको मैं ।


- डॉ.संतोष सिंह