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Hymn No. 397 | Date: 05-Oct-1998
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हमनें युं ही बहुत कुछ पा लिया, जिनकें लिये लोग भटकतें है गुफाओं और कंदराओं में।
हमनें युं ही बहुत कुछ पा लिया, जिनकें लिये लोग भटकतें है गुफाओं और कंदराओं में।

कीतने – कीतने यज्ञ और होम होते है, इसके लिये इस तूच्छ ने गीत के इक् टूकडे से पा लोग उसको।

क्याँ – क्याँ बलि दें देते है लोग तेरे लिये, मैं चढाना चाहता हूँ अपनी बलि तेरे चरणों में।

बहूत सारी है लालनामें जो दूर रखे रहती है हमें तुझसे ।

तोड़ना होगा राह में, आनेवाले हर दीवारों को, जिनका जन्म हुआ है इच्छा और वासना से।

शस्त्र होगा हमारें पास उसका आशीष जो तोड़ने में सबसे कारगर होगा।

जब शरण में है उसकें हर डर को निकाल कें निर्भय बनकें जीना पड़ेगा।

हर दौर गुजर जायेगा, उसके संग का अंत होगा ना कभी ।

अच्छा – बुरा भी बदल जायेगा, जातें ही उसके करीब ।

दिल से जो पुकारतें है उसको, उनकें हर आवाज पे तो दोडा चला आयेंगा।


- डॉ.संतोष सिंह