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Hymn No. 407 | Date: 08-Oct-1998
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जीवन का हर लमहाँ तेरा है, कीसी फेर में फिर क्यों पड़ना।
जीवन का हर लमहाँ तेरा है, कीसी फेर में फिर क्यों पड़ना।
डरना ना है कीसी से, जब शरण लिया तेरे चरणों में ।
हर चीज की भरपाई होती है, पर तेरे करीब ना रह सका तो, जीवन में कीतनी कमाई कर लूं, उसकी भरपाई ना होगी।
तेरा साथ जो मिला है, उन पलें का ना कोई है तूलना ।
तूलना तो दो से एक लोगों की है होती, इस ब्रह्माण्ड में तू तो बस एक है ।
पता नहीं ऐसी कौन सी डोर से जो बांध रखा है तूने हमें ।
अदृश्य है तेरा बंधन, हर दिन गुजरनें पे तेरे करीब होता जा रहा हूँ ।
फनाह हो जाना चाहते हौ तूझपे बनकें परवाना।
जो रख बचें वो भी हवा के संग धुलकें, मिल जाना चाहता हूँ तुझमें।
मेंरी समझ से परें है तेरी बातें, हम तो तूझे प्यार ही प्यार करना चाहते है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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सीखा दें हमे नाम लेंना तेरा, गुंजता रहे दिलों में हमारें हर पल नाम तेरा।
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प्रभु तू यें बता दें, जगत में रहतें हुये जुडना कैसे है तुझसे ।
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