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Hymn No. 408 | Date: 09-Oct-1998
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प्रभु तू यें बता दें, जगत में रहतें हुये जुडना कैसे है तुझसे ।
प्रभु तू यें बता दें, जगत में रहतें हुये जुडना कैसे है तुझसे ।
इस जीवन कें हर चक्रव्युह को भेदतें हुये तेरे पास कैसे है पहुंचना।
दायीत्वों को निभाते हुये, इन सबसे पार पाना है कैसे ।
पकड रखना चाहता हूँ तूझपे, पता नहीं कब रम जातें है संसार में।
अच्छे – बुरें का डर नहीं है हम को, पर इस मायजाल को तोड़ना है चाहते।
कोई दूराव – छिपाव ना हो तुझसे, दिल में बस प्रीत ही प्रीत हो तेरे प्रति।
तेरे बतायें कार्य सर्वपरि हो, निभतिं हुये उसको आनंद में रहे हम।
मन में ना आयें कभी हिचक और शक, तेरे प्रेम से ओत – प्रात्sा हो हम।
तू ही तू रहे हमारें दिलों में, और इस तन – मन में ।
मनन् होता रहे तेरा, संसार कें हर कार्य को करते हुये।
- डॉ.संतोष सिंह
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