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Hymn No. 42 | Date: 15-Oct-1996
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मैं तो तेरा मान बढ़ाना चाहता था, अंजाने में हो गया अपमान ।
मैं तो तेरा मान बढ़ाना चाहता था, अंजाने में हो गया अपमान ।
गलती तो हो ही गयी मुझसे, सजा देया कर क्षमा, है तेरे हाथों में ।
निरादर का कोई प्रश्न ही न था, पर ये तो कर्मों का खेल है।
तेरे चरणों मे मेरा शीश है, कुचल दे या आशीष दे ।
ये तो है तेरे हाथों, में बहानों में नही बहाना मुझको – तुझको।
बस अवगत कराना चाहता हूँ सब कुछ तो है तुझे पता ।
मैं तो बस खुद को अहसास कराना चाहता हूँ शेष तो तेरे हाथों में है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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