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Hymn No. 43 | Date: 18-Oct-1996
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आनंद ही आनंद है, आनंद ही आनंद है ।
आनंद ही आनंद है, आनंद ही आनंद है ।
आनंदमय तू है, आनंदमय तेरी सृष्टि ।
तेरे सब रूप में आनंद है ।
तेरे सब नाम में आनंद है ।
सुख – दुःख के परे आनंद है।
सुख – दुःख में आनंद है ।
तन में आनंद, है मन मे आनंद है ।
ऐसा कुछ नहीं पाया; जो निरान्नद हो ।
सर्वत्र आनंद ही आनंद है, आनंद ही आनंद है।
- डॉ.संतोष सिंह
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मैं तो तेरा मान बढ़ाना चाहता था, अंजाने में हो गया अपमान ।
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