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Hymn No. 454 | Date: 01-Nov-1998
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तू हमे अपने सम्पूर्ण साम्राज्य का सत्ताधीश बनाना है चाहता ।
तू हमे अपने सम्पूर्ण साम्राज्य का सत्ताधीश बनाना है चाहता ।

हम अपने क्षुद्र संसार में कुत्सित वासनाओं के संसार में रम जातें है ।

नियंत्रण अपने आपका तेरे हाथें में दे रखा था।

पता नहीं कब खुदकें हाथों में लेकें वासनाओं के सागर में बहतें चलें जाते है ।

रमना ना आया तुझमें, तेरे साथ रहतें हुये गुजारे कीतनें दिन।

पल भर में बना – बनाया मन का बांध टूटकें माया के संग मेल कर बैठता है ।

पिता कई बार हुआ ऐसा, जानतें हुये गर्त कें दलदल में जा फसतें है ।

दोष ना तेरा कुछ है, मैं मगरूर टांग अडता फिरता हूँ, गिरनें पे रोता हूँ तेरे सामनें बैठकें।

कब जानुंगा मैं तेरे सच्चे प्यार की कीमत, शाश्वत आनंद को, छोडके जलत है बार – बार नश्वर संसार में ।


- डॉ.संतोष सिंह