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Hymn No. 453 | Date: 01-Nov-1998
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कभी मन में यें, कभी मन में वो, इसी में बीत जाता है जीवन का हर पल ।
कभी मन में यें, कभी मन में वो, इसी में बीत जाता है जीवन का हर पल ।
अपने आप से मुक्त ना हो पातें, विचारों का द्वंद्व सदा चलता रहता है भीतर ही भीतर ।
सब कूछ जानतें हुये स्वीकार ना कर पातें है, स्वत को भूलाकें जीवन जीतें है हम ।
मन के बाणों से दिल को लुहलुहान करतें रहतें है, सीमट जातें है तन की सीमा में ।
चलतें है प्रभु की ओर, इच्छाओं की राह पकडते ही दूर हो जातें है परम आनंद से ।
हर क्षण मिटतें हुये देखतें है हर क्षण को, क्षणिक सुख के दलदलों में धसतें चलें जाते है।
खुद भी खुद को देते है लानत, बरसाते है सभी पे लानत कीसी ना कीसी बात पे।
कसुरवार है हर दुःख के हम ही, दूसरों का रोना क्यों रोतें फिरतें है हम ।
जो समझ के ना समझ पातें है, समझा दें अंतरमना को बाहर से ना जुडकें भीतर से
लालायीत है हम तेरे जग में काँटें ना बनकें फूल बनकें रहना चाहते है हम जुडना चाहते है।
- डॉ.संतोष सिंह
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