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Hymn No. 456 | Date: 03-Nov-1998
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भटका तन, भटका मन, दिल बिचारा संग – संग भटकता रहाँ ।
भटका तन, भटका मन, दिल बिचारा संग – संग भटकता रहाँ ।

प्रभु के शरण में गया था, भटके हुये तन – मन का संग पाकें दूर तुझसे होता चला गया।

रोपां था बड़ी मेहनत से प्यार के बीज को दिल में, खुमाँरी की वजह से बीच में मुरझानें लगा।

हर इच्छाओं के पीछे मन को दौडाया, धीरें – धीरें तन थकता चला गया।

पाया था बहुत कुछ प्रभु कृपा से, एक एक करकें खोता चला गया।

फरियाद सदा किया प्रभु से, अपने दुःखों का रोना बार – बार रोया।

धीरे – धीरे तन के वासनाओं के घोल में घुलता चला गया।

शुन्य से किया था शुरूआत, अंत में शुन्य में सब कूछ खोता चला गया।

कूछ भी हो प्यार हम परम् से है करते, हर पल परम् के संग है रहतें ।

वो परम है समाया, अपनी परम् सत्ता के संग हर कण – कण में ।


- डॉ.संतोष सिंह