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Hymn No. 457 | Date: 04-Nov-1998
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दिल से छलक उठता है प्यार मेरा तेरे लिये बनकें उमंग ।
दिल से छलक उठता है प्यार मेरा तेरे लिये बनकें उमंग ।
तूझ से आती तरंगों से घिरा पाता हूँ खुदको, मदमस्त हो जाता है मन मेरा ।
तन झुमें – मन झुमें, रोम – रोम झूमता है सुनकें तेरे गीतों को ।
तेरे सान्निध्य में रहके अविरल प्रेम की धारा में बह जातें है ।
जीवन का हर पल गुलजार हो जाता है तेरा साथ पाकें ।
दिल तडप उठता है तूझे देखतें ही, तुझसे लिपट जाने का मन करता है ।
हर शर्मा, हया छोडके तेरे कदमों में बिछ जाने का मन करता है,
लोग क्याँ सतायेंगे मुझे, हम तो खुद सतायें हुये है अपने दिल के हाथों तेरे वास्तें ।
अब तेरे प्यार में कुछ नागवार नजर ना आता है हमको ।
तेरे इनकार, एकरार की परवाह ना है मुझे, प्यार के जननू में मिल लेतें है हर रोज तुझसे ।
खो जान है मुझें, इन वादीयों मे बनकें तेरे मेरे प्यार की दास्ता ।
कोई सुनें या ना सुनें पुकारता रहूंगा तूझें हवा के झोकों के संग इन वादीयों में चिरकाल तक।
- डॉ.संतोष सिंह
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