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Hymn No. 458 | Date: 04-Nov-1998
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बैचेन हूँ मैं, मेरे दिल की आवाज सुननें के लिये ।
बैचेन हूँ मैं, मेरे दिल की आवाज सुननें के लिये ।
मनोंभावो में दब गया हूँ इतना, सच का पता चल ना पाता है मुझें ।
मनकीं कामनायें दीवार बनके खड़ी रहती है मेरे सामनें ।
तन बांधे रखता है मुझें इच्छाओं की सीमा में।
दिल का हाथ पकडकें भाग जाना चाहता हूँ तन – मन की दीवार को तोड़कें।
दिलदार का दीदार करना चाहता हूँ दिल के नजरों से ।
इक् बार हो जाये दीदार उसका, कोई ना काबु कर पायेंगा इस दिल पे ।
हाल बूरा होता है तन – मन का तो होने दें, दिल गुहार लगायेंगा प्यार को ।
दम रहे या छूटें प्यार के पास में दिलदार को जकड लेना है ।
दिल की आवाज कहतीं है, आज नहीं तो कल मुलाकात होगा दिलदार सें।


- डॉ.संतोष सिंह