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Hymn No. 459 | Date: 05-Nov-1998
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हमारें बस की बात ना है, पाना तेरा सान्निध्य।
हमारें बस की बात ना है, पाना तेरा सान्निध्य।
दया तेरी है जो चलें आते है तेरे दर पे ।
प्रतिकार तू ना करना कभी हमारा, तू तो है विशाल ।
हम तो क्षूद्र तन के स्वामी, भटकते मन कें पीछें ।
तूने सीखाया बहुत कुछ हमें, प्रेम से इस जग को जीतना ।
हमारें कर्म तेरे कीयें पे पानी फेरतें रहतें है।
एक बार नहीं सौ – सौ बार आगाह किया तूने।
कुसित इच्छाओं के वश में होके खुद धोखा खाया तूझे भी धोखा दिया।
दिल खोजता है तूझे तेरा सान्निध्य पानें के लिये।
तन भटक जाता है मन के वश में होके।
दया करना तू हर लोभ, मोह, माया, मत्सर न जाने क्यों – क्यों से दूर रखना हमें ।
निर्मल – निश्चल होके बन सकें तेरे चरणों की धूति।
- डॉ.संतोष सिंह
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