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Hymn No. 522 | Date: 25-Dec-1998
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विरोध करता रहता हूँ मैं सदा अपना, अपनी वृत्तियें का गुलाम हूँ मैं।
विरोध करता रहता हूँ मैं सदा अपना, अपनी वृत्तियें का गुलाम हूँ मैं।
स्वतंत्रता का अहसास कई बार किया मैंने, हकदार ना हूँ स्वतंत्र होनें का।
अभय होनें का वरदान दीया है तूने, अब तक निश्चिंत ना हो पाया मेंरा दिल ।
अहसास रहता है सदा मुझे तेरे आशीष का, पर तेरे छत्र – छाया में लायक नहीं मैं ।
गवाया था सब कुछ बदतर हालत थें मेरे, दरबदर के ठुकरायें हुये को शरण मिला दर पे तेरे
नजर मिलानें की ताकत ना थी हममें, अपनी नजरों में गिर चुकें थें।
इस चुकें हुये को सहारा दिया हर रूप में, अपने पैरों पे खडा हुआ मैं कृपा पात्र बनकें तेरा
इक् बार तुझसे फिर से हम गुजारीश करते है, पखाँर लेनें दे हमें इन खारी बूदों से तेरे चरणो को।
इनायत कर तू मुझपे, मेरे भीतर कायापलट कर दें तेरे मुताबिक ।
मुझे कोई ना है अपना बनकें है करना, हर दौर को गुजरतें हुये कई बार देखा है हमनें ।
- डॉ.संतोष सिंह
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तकरार चलती रहती है, दिल में मेरे हर पल संग तेरे ।
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खराश कहीं है दिल में अभी, जो तू इन क्षुद्र नैनों से नजर नहीं आता ।
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