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Hymn No. 523 | Date: 26-Dec-1998
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खराश कहीं है दिल में अभी, जो तू इन क्षुद्र नैनों से नजर नहीं आता ।
खराश कहीं है दिल में अभी, जो तू इन क्षुद्र नैनों से नजर नहीं आता ।
अपनी कमजोरीयों को भांपते है हम, तेरी कृपा बिना दूर नही कर पायेंगे।
सौगात तूझे देनें के लायक ना है हम इस क्षुद्र के प्यार को स्वीकार कर लें तू।
तूने तो प्यार की बयार बहाया सदा से हमपे, निर्मम है हमारा दिल जो स्वीकार ना करते है इसे।
कोयले बिखड़े पड़े है तेरे दौलतखानें में हीरों में बदलना बस तेरे हाथों में है।
तेरे द्वारा बतायें शब्दों को कोरें कागद पे बिखेरता रहता हूँ ।
जुगत इतनी है बस मेरी अपने प्यार को काबील बना सकूं मैं तेरे लिये ।
अंधकार में डूबा हुआ हूँ कई काल से एकबार नजर पड़ जाये तेरी, दिल से फॅट पड़ेगी।
दरद तूझें हमनें दिया कीसी ना कीसी बात पे, विशाल हद्रय वाले फिर भी तूने ना छोडा साथ हमारा।
सब कुछ पाकें हाथ आनें वाला कूछ हमारे जो तू मिल गया तो हाथ आ जायेगा सब कूछ हमारे।
- डॉ.संतोष सिंह
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विरोध करता रहता हूँ मैं सदा अपना, अपनी वृत्तियें का गुलाम हूँ मैं।
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इतना सता तू मुझे, गुहार लगाता रहूँ हर पल मैं तूझे ।
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