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Hymn No. 531 | Date: 30-Dec-1998
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अलग – अलग पड़ जाता हूँ तुझसे, जब दिल मेंरा दूर हो जाता है तुझसे ।
अलग – अलग पड़ जाता हूँ तुझसे, जब दिल मेंरा दूर हो जाता है तुझसे ।
इस मन को कुछ नहीं सुहाता, जब सान्निध्य हम तेरा नहीं पातें ।
सच – सच कहूँ दिल की तो, मुझे कुछ आता जाता नही तेरे नाम के सिवाय।
जो कुछ भी कमाया तेरी दया से, लायक तो मैं कूछ भी के नहीं ।
जो कमीयाँ संसार भर में है वो मुझमें मीलेंगी, जो मुझमें मीलेंगी वो ना कहीं मीलेंगी।
तू कीतना महान है, तेरा हद्रय कीतना विशाल, जानकें सब कूछ स्वीकारता तू हमें ।
मेरी हर बात झुठी, सच्चिदानंद मैं तरसता हूँ तेरे लिये कभी – कभी ।
संसार से कट कें कोनें में हो जाता हूँ, जब याद तेरी आती है दिल में उसे संजोता हूँ ।
मेरे शब्द हो जातें है अधुरे, जब प्यार में तेरे डूबकें तेरी चर्चा में तुझसे करता हूँ ।
आसान नहीं है यें राह फनाह होना पड़ता है कई बार, पर मै तेरा दामन पकडना हूँ चाहता।


- डॉ.संतोष सिंह