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Hymn No. 530 | Date: 30-Dec-1998
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अमृत से भी मीठा नाम तेरा, आनंदमय तेंरा स्वरूप।
अमृत से भी मीठा नाम तेरा, आनंदमय तेंरा स्वरूप।
ज्ञान तेरे चरणों में विराजें, प्रेम की गंगा बहती है सदा तुझसे ।
तुझसे परें कोई नहीं, तुझमें समाया है सब कूछ ।
डुबकी लगायी जिसनें तुझमें, नित्य नया – नया कुछ पाया ।
अनोखें में अनोखा तेरा संसार, उससे अनोखा तू।
हर शब्द को झुटलाता तू, कोई ना कर सके तेरी व्याख्या।
जिसनें दिल को तुझमें लगाया, उसके चित्त में तू विराजें ।
मन का धन सौंपा जिसनें, उसनें कुशलता से पूरी की अनंत यात्रा।
प्रेम में बंधके तू सब कुछ सौंपे, घमडो का घडा हर पल टूटा सम्मुख तेरे।
तेरे बिन अधुरें है चिरकाल से हम, जुड़े हुये तुझसे सदा से ।
जो तू स्वीकारें वहीं हम स्वीकारेंगे, प्रेम से सब कूछ है हमें समझना।
- डॉ.संतोष सिंह
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