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Hymn No. 615 | Date: 18-Jan-1999
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प्यार के बारे में सुन रखा था, ना किया था कीसी से ।
प्यार के बारे में सुन रखा था, ना किया था कीसी से ।
दिल तो था सीनें में, उसे जान न था कभी ।
बरबादीयों का जश्न मनाता था, माया के पीछे – पीछे ।
एतबार कीसी पे क्यों करनें लगा मैं जब खुद में ही ना था ।
हर संगत किया निपट अकेला हमनें ।
कर्मों का भार पड़ा, जब याद आ गयीं तेंरी ।
शर्मोशार हुये हरकतों पे अपने, भाँती हुयी दुनीयाँ खराब लगनें लगी।
दोष ना देता हूँ कीसी को, खुद को दोषी पाता हूँ ।
बाज क्यों नहीं आता इन सबसे, अकेला हो जान चाहता हूँ ।
मैं कुछ पाना नहीं हूँ चाहता, यूं ही गुजर जाना हूँ चाहता ।
मैं ना को ना हूँ चाहता, हाँ से कोई मतलब ना है मुझें ।
याद आया तू तो ठीक है, तेरे छत्र-छाया से जाने वाला नहीं मैं ।


- डॉ.संतोष सिंह