VIEW HYMN

Hymn No. 614 | Date: 18-Jan-1999
Text Size
क्यॉ चाहते है हम तुझसे, खुद नहीं जानतें ।
क्यॉ चाहते है हम तुझसे, खुद नहीं जानतें ।
इतना जरूर है कैसे भी, सामीप्य तेरा पाना है चाहते ।
करना क्या होगा, हमें ना है कुछ पता ।
कौन सी राह जाये तेरे दर की ओंर, उससे अन्नभिज्ञ मैं ।
युं ही पुकारू तुझको, तेरी कृपा से तुझको बुलाऊँ ।
क्यूं ऐसा हूँ करता, कारण होगे अनेक, सचमूच मुझे कुछ ना पता।
कैसे फूटां इस दिल में तेरे प्यार का अंकूर ।
अंजान था मैं इससे, पाकें निहाल हो गया।
बदहाली में रहता था, घिरा हुआ गमों से अपने ।
तेरे अमृतमय गीतों से नवजीवन का संचार हुआ मुझमें ।
हक् तो मेंरा तूझपे ना है कूछ, ऐं मेरे परमपिता।
जीता नहीं अपने आपको, चरणों में तेरे खुद को सौंपनें चला।
लंबी है बानीं मेरी, कोई सार नहीं उसमें ।
चाहता हूँ तेरी कृपा और रजा, तेरा सान्निध्य पानें के लिये ।


- डॉ.संतोष सिंह