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Hymn No. 635 | Date: 21-Jan-1999
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मोह से दूर भागता था मैं, मोह लिया तूने मुझें ।
मोह से दूर भागता था मैं, मोह लिया तूने मुझें ।
प्यार की बात न मानता था, पड़ गया तेरे प्यार में ।
होनें को होनें देता, जड बुध्दि कहती कुछ न जाता है हमारा ।
भाव में तेरे बह गया, हर बात हद्रय को है छु जाती ।
बदलाव कहाँ से आया, मैं जानं न पाया ।
आँख बंद थी खुलनें पे अपने आपको तेरे दर पे पाया ।
सुना बहुत कुछ था, प्यार की चोट कोई सह न पाता ।
इशारा जो तेरा हुआ, खुदको तेरे प्यार में भूलाता चला गया।
संवरनें की चाह ना है मुझें, दिल जो तेरे प्यार में है डूबा ।
बह जाये वो कहीं, अब बिगडनें का डर ना होता ।
कैसे बयाँ करूँ प्रभु, तेरी कथा को मैं ।
जहाँ भी हाथ मारूँ मुझे कोई ओर – छोर नजर नहीं आता ।
- डॉ.संतोष सिंह
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