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Hymn No. 660 | Date: 27-Jan-1999
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लिखानें वाला तू, लिखनें वाला मैं ।
लिखानें वाला तू, लिखनें वाला मैं ।
कहलानें वाला तू, हनें वाला मैं ।
जन्म लेता हूँ तूझसें, मिट जाने के लिये तुझमें ।
संसार को भोगता हूँ मैं, भोगानें वाला तू ।
सब कूछ कराता हूँ, नहीं करता हूँ कुछ मैं ।
आकार में ढालता हमें, निराकार रहेके खुद ।
खाँबो को तू है देखता, साकार करता हमेशा ।
अजीब है दासता, हर रास्ता जाता तेरी ओंर ।
छोर है अलग – अलग, फिर भी नहीं थलग ।
परम् तू कर्ता एक, मतवाले है हम ।
दूर ना रह सकता हमशें, तुझसे तूझे मांगते हम ।
अकाल तू, हर काल मे बडते तेंरी ओंर ।
जुदा कई बार हुये, ना जुदा होनें के लिये ।
सतातें है हम तूझें, तेरा प्यार पानें के लिये ।
संतान है हम तेंरी, तरसतें है हम पिता के लिये ।
बता दें तू हमें, देकें ना देंता सब कूछ क्यों हमें ।
अधुरी हसरतों को जन्म देनें वालें, कब करेंगा पूरी हसरत हमारीं ।


- डॉ.संतोष सिंह