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Hymn No. 67 | Date: 02-Jan-1997
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क्या कहूँ क्या ना कहूँ फितरत मेरी मुझको ही ना समझ आये ।
क्या कहूँ क्या ना कहूँ फितरत मेरी मुझको ही ना समझ आये ।
चाहूँ क्या न चाहूँ क्या इतना उलझा हूँ मैं खुद से खुद को जान न पाऊँ।
दम ना भरता हूँ कुछ होने का अपना मिटने को हर दम तैयार हूँ तुझपे ।
गम ना है मुझे अपना कुछ खोने का, खुशी होगी कहने को तो कुछ है अपना ।
मैं मैं से जाना चाहता हूँ निकल, हर तन में बसे हुये मन में जाना चाहता हूँ समाँ ।
- डॉ.संतोष सिंह
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जब – जब गिरा नजरों में अपने, तब – तब तूने मुझको उठाया ।
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रोके रोक सका ना कोई, बीत जाता है हर पल ।
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