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Hymn No. 681 | Date: 31-Jan-1999
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दास्ताँ क्याँ क्याँ करूं अपने प्यार की, जो खुद ढल चुका है प्यार में तेरे ।
दास्ताँ क्याँ क्याँ करूं अपने प्यार की, जो खुद ढल चुका है प्यार में तेरे ।
शब्द लाख हूँ खोजता, कहनें को कूछ ना पाता हूँ प्यार के सिवाय ।
एक ही शब्द है जो रोम – रोम में रोमांच भर देतां है नाम लेतें ही तेरा ।
नशा अब कोई काम का ना है लगतें, प्यारे के नशें पे कोई दूजा नशा ना है चढता ।
क्याँ हो गया है मुझे, कुछ कर पानें के लायक ना रहा मैं, तेरे प्यार का शिकार हो गया।
हरकतें करता हूँ उल्टी – सीधी प्यार में, ना खुद समझ पाता ना कोई ओर ।
समझाया तूने कई बार हमें, सुनकें अनसुना करता रहा, जेहंन में जो समाई है तेरी सुरत ।
बहोत कोशीश किया इजहार करूं अपने प्यार का, देखतें ही तूझें होश में ना रहाँ ।
साथ ना देंती है इद्रियाँ मेरी कुछ का कुछ करती है, जैसे जुदा हो गयीं मुझसें ।
तरस न खाना तू मुझपे, जुदा हुआ खुदसे हो जाने देना पास अपने बुला लेना ।


- डॉ.संतोष सिंह