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Hymn No. 683 | Date: 31-Jan-1999
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बजां की ताकत है इस प्रेम में, इसकें आगे झुकतें पाया सबको ।
बजां की ताकत है इस प्रेम में, इसकें आगे झुकतें पाया सबको ।
पुकारा जब उसनें प्रभु को, उतरना पड़ा जमीं पे ।
कोई ना टिक सका आगे इसकें, धर्म के हर दीवार को टूटतें पाया ।
लाघा है इसनें भेंद की खाई को, फंसा जो गिरफत में इसकें बैठें प्रभु को पाया ।
कीसी का वार ना चलता, जो प्रभु प्रेम में है ढल जाता ।
सदियाँ बीतें पलों में, जो खोयें रहतें है प्रभु प्रेम में ।
हर कोई सजंदा करें इसकें आगे, जो गातें है गीत के प्रेम के।
गैरों की तू छोड प्रेम तो दुश्मन भी करतें है प्रेम से ।
झुठां ना पड़ा यें कभी, रूठें हुये को मनाता है प्रेम से ।
जानतें तो सब है, प्रेम करनें वाले दो - चार होते है धरा पे ।
मुरझाया हुआ भी खिल जाता है प्रेम के चक्कर में ।
मोहताज ना हें कीसीका, मोहताज है हर दिल इसका ।
- डॉ.संतोष सिंह
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