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Hymn No. 684 | Date: 31-Jan-1999
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द्वंद चलता रहता है हमारें भीतर, कभी अकेले ना हो पातें हम जीतेंजी ।
द्वंद चलता रहता है हमारें भीतर, कभी अकेले ना हो पातें हम जीतेंजी ।
णौत के बाद पड़ जाती है पीछें करम और इच्छायें, ना मिलती है मुक्ती तब भी ।
मौंका रहतें सम्भल न पायें, यें जीवन दास बनकें गुजारा अपनी वृत्तीयों का।
चिता पे खुद चढ गये अपने चित्ताओं को न चढा पायें, ठोया न जाने कीतनें जन्मों तक ।
हाथ कई बार आया तू हमारें, जतन ना कर पायें बद करकें दिलों में अपने ।
खाँब कई बार देखा तेरा, मीत ना बना सकें अपने मन का ।
साथ हर बार निभाया तूने वादा खिलाफी करकें हाथ से जाने दिया तूझें ।
इतना कमजोर बुत क्यों बनाया, कम से कम अपना ना, ख्याल रख लेता हमारा।
हाल दिल का वही पुराना, अंजाम की परवाह कयें बिना दिल लगाया है तुझसे ।
रोक ना सकता अपने आपको, खाने को ना तैयार हूँ तूझें जो होगा वो देखां जायेगा।


- डॉ.संतोष सिंह