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Hymn No. 685 | Date: 31-Jan-1999
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लुभाती है मन को न जाने कीतने – कीतनें तरह के खाब ।
लुभाती है मन को न जाने कीतने – कीतनें तरह के खाब ।
कमजोर ना है हम, कमजोर बना देता है हमें न जाने कैसे ।
खेल खेलती है हमारी इच्छायें, विषयों को देख देखकें ।
पहले जान न पाते थे कब फंस जातें थे घोर कर्मों में ।
अब तो अहसास होता है हर पल तरह – तरह के क्रिया कलापों का ।
आनंद आता है सबमें चाहें लिप्त रहे या निर्लिप्त ।
खुशीयाँ और दुख के चक्र आते जाते है जीवन में ।
पड़ती रहती है छाप इसकी मन पे, अब तो मौंज में रहतें है हर पल ।
तन – मन पे जो होना है होता रहे, हम तो हर पल रहते है साथ उसके ।
जैसा चाहें वो रख दें, प्यार कें सिवाय गम और खुशी की कोई बात नहीं ।
- डॉ.संतोष सिंह
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