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Hymn No. 688 | Date: 01-Feb-1999
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हम तो है शरण में तेरे, जन्म लेनें के पहलें से ।
हम तो है शरण में तेरे, जन्म लेनें के पहलें से ।
मैं कुछ ना हूँ जानता, दिल कहता है तू सब कुछ जाने ।
किया तूने बहुत कुछ हमारें लिये, हर बार फेंरा हमनें पानी ।
जीवन कई - कई बार जीया, हर बार बिछड़ें अपनीं कारस्तानी से ।
पीछला भूलाकें तू हर बार आया, घर लें चलनें के लिये ।
छोडा ना साथ तूने कभी, हमनें ही तुझको है छोडा।
न जाने में सब क्यूं कहता हूँ, मन मजबूर करता है ।
बहुत कुछ ऐसा है, जो मैं ना हूँ जानता ।
मैं अपने आपका त्याग करकें तेरा वरण कर लेना हूँ चाहता ।
मेरी मनोरथ कोई ना हो पूरी, जरूरत बन चूका हें तू मेरी ।
दुर्बल ना हूँ मैं इतना, कबूल करूंगा तूझे हर बाधा से टकराकें।
लौटा नहीं सकता अपने आपको, जो बढ चुका हूँ तेरी ओर ।


- डॉ.संतोष सिंह