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Hymn No. 695 | Date: 03-Feb-1999
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हमारें जीवन के हलाहल को पीनें वाले प्यारें पिता ।
हमारें जीवन के हलाहल को पीनें वाले प्यारें पिता ।
प्यार की माला ना देकें, तूझें देतें है कर्मों का उपहार ।
मिला है अनुपम प्यार तेरा, भूलाकें उसे खोतें है संसार में ।
अमृतमय गीतों को सुनाकें, तू निष्कपट बनाता है हद्रय को हमारें ।
हर बार तूने सींचा है, हमारे हद्रय को अपने निर्मल प्रेम से ।
ऐंसी कौन सी आग है वासना की, जो जलती रहती बुझती ना कभी ।
हमारें उम्मीदों का केंद्र तू है, तेरे सिवाय संसार धोरण है ।
भरोसा हर बार तू हमपे है करता, हम ही फिर जातें है ।
कसम देते है तूझें अनेक, खुद कसमों को तोड़ते है आयें दिन ।
मेरे मालीक बिन तेरे हम है नहीं, नहीं स्वीकार करता हूँ भीतर से ।


- डॉ.संतोष सिंह