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Hymn No. 696 | Date: 03-Feb-1999
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प्रभु कहाँ चला जाता है प्यार हमारा, अचानक क्यों उमड पडता है घृणा ।
प्रभु कहाँ चला जाता है प्यार हमारा, अचानक क्यों उमड पडता है घृणा ।
विमुख क्यों हो जाते है तुझसे, मन ही मन प्रलाप करतें हुये ।
प्यार हमेशा से तुझसे हो जाता है, आवेग में हम क्यों बह जातें है ।
कब तक चलेंगी उठा – पटक भीतर हमारें, कब शांत होगे हम ।
हम अपनी हर चाहत तूझें सौंपते है, फिर क्यों हो जाते है आहत ।
पानें की लालसा मन से निकल चुकी है, फिर क्यों खोनें से डरते है ।
यें कैसी आग लगी है दिल में, समझ न पाया ये कब बुझेंगी ।
कमजोर बहुत हूँ पर हार मान लेनें वालों में से मैं ना हूँ ।
मेरा जन्म तो प्यार के भीतर से हुआ है, फिर राग क्यों करता हूँ ।
मैं निकल जाना चाहता हूँ हर भाव से, जो बाधा डालें मेरे प्यार में ।


- डॉ.संतोष सिंह