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Hymn No. 709 | Date: 05-Feb-1999
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जो कुछ भी है प्रभु का, प्रभु के सिवाय नहीं किसीका ।
जो कुछ भी है प्रभु का, प्रभु के सिवाय नहीं किसीका ।
प्यार तो उसीसे होंना है, बाकी तो सब मोह का है बंधन ।
जानते है सब कोई, फिर भी अंजान बनके कर्म करते है ।
धर्म तो निभाना पड़ता है उसको, गले में फल का हार पहनना पड़ता है ।
रोना आता है जब किया हुआ अपना विचलित कर जाता है ।
दौड़ लगाते है पास उसके, कदम बंधे होते है इच्छाओं में ।
तब याद तेरी आती है, पास अपने तू किसी को नहीं पाता।
सब कुछ भूलाके साथ तो निभाता है, जख्मों को सहलाता है ।
हर लेता है दर्द मन का, रुख मोड देता है परम की ओर ।
सहजता से सीखता है जीवन जीना, दिल लगाके परम पिता से ।
- डॉ.संतोष सिंह
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