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Hymn No. 708 | Date: 05-Feb-1999
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उसकी बात करता है तू फिर क्यों आस रखता है ।
उसकी बात करता है तू फिर क्यों आस रखता है ।
विश्वास रख तू उसपे, पूरा करेगा हर काम बिन कहे ।
मन में न आने दे तू कुछ, इतना दृढ प्रतिज्ञ हो जा ।
जनम मत लेने देना इच्छाओं को, हर कर्म करना बनके उसका ।
परवाह न करना सच्चे-झूठे की कोई रूंठे या हँसे रंज इस बात का न रखना ।
हित हो न अहित इससे परे होके ध्यान में खुदा को रखके कुछ भी करना ।
सार्थक है यहा सब कुछ, निरर्थक न है कुछ जग में ।
आये है हम सब अकेले, जायेंगे छोड़ सबको अकेले ।
काम कोई नहीं आयेगा, साथ सदा तो तेरा निभायेगा ।
ढलना है उसके सोच में, जीवन की आँच में पक के ।


- डॉ.संतोष सिंह