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Hymn No. 707 | Date: 05-Feb-1999
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आज शरारत करनें को मन करता है, अब तक छिपा रहता था तू ।
आज शरारत करनें को मन करता है, अब तक छिपा रहता था तू ।
आज हमको छिप जाने का मन करता है, ढुंडना पड़ेगा तूझें मुझें ।
मैंने ढुंड लिया है छुप जाने की जगह, ढुंड न पायेंगा तू कभी ।
दूर ना है कहीं तुझसे, तेरी कृपा से रहेगे साथ तेरे ।
फिर भी पता नहीं पायेंगा, सर्वज्ञाता ढुंडना पड़ जायेगा तूझें ।
हार मान लें तू मुझसे, बता दूंगा तूझे मैं वो जगह ।
हैरान तू रह जायेगा, जो दिल कें भीतर तेरे मुझे पायेंगा।
पहचानना होगा मुश्किल मुझको, वहाँ तो तू खुद को पायेंगा।
न जाने कीतनें जनमों का ये अभागा तर जायेगा, अपने प्यार से तूझें रिझायेंगा।
सदा के लिये तेरा कहलायेंगा, इस बार छिपा तो कोई ना जुदा कर पायेंगा।


- डॉ.संतोष सिंह