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Hymn No. 712 | Date: 06-Feb-1999
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चल पड़ा इक राही अकेले, प्यार की राह पे ।
चल पड़ा इक राही अकेले, प्यार की राह पे ।
अनजान है वो इन सबसे, न ही पहचान है किसीसे ।
देखी झलक इक बार, प्यार के हाथों मजबूर हो, कर बैठा प्यार ।
यार तो न आया सामने, प्यार से किया हौसला अफझाई ।
बेखबर सबसे हम, चल पड़े उसकी और नाम लेते हुये उसका ।
एक-एक करके साथ छूटा, लोभ-मोह ईर्ष्या न जाने क्यों-क्योंका ।
दिल की तड़प देखके मन चल पड़ा चुपचाप साथ उसके ।
तन बदला - मन बदला, बदलना पड़ा उसके इशारे पे सबको ।
पहूँचा जब दर पे उसके, दर का द्वार खुला पाया ।
अंतर में अपने आपको, उसको पाया समाया था उसके भीतर सारा संसार ।
- डॉ.संतोष सिंह
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