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Hymn No. 726 | Date: 09-Feb-1999
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तेरे सामने बैठते है रोज, कहाँ है बहुत कुछ तू ।
तेरे सामने बैठते है रोज, कहाँ है बहुत कुछ तू ।
समझना चाहते हुये समझ नहीं पाता मैं कुछ ।
लोग निगाहों की बात जान लेते बिन कहे ।
बतलाते है इक दूजे से निगाहों ही निगाहों में ।
अनाड़ी मैं, दिल से कही तेरी बात जान नहीं पाता ।
कैसे सहता है तू मुझे मुस्कराके, मैं जान नहीं पाता ।
मगरूर हूँ मैं इतना, अपनी मगरूरियत में तुझे पहचान नहीं पाता ।
फिर भी तू मुझे पास अपने बुलाता, प्यार का गीत सुनाता ।
बदलते हये लोगों को देखा, बदलना न आया मुझे ।
रहा मैं कही भी, निरंतर तेरा प्यार पाया ।
सींचा है प्यार से हमारे दिलों को, बिना किसी भेद के ।
प्यार का अंकुर जड़ जमायेगा जरूर, मुरझाने न देना तू कभी ।
- डॉ.संतोष सिंह
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