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Hymn No. 748 | Date: 15-Dec-1999
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आधीन रहते है हम तन-मन के, चाहके बेड़ियाँ तोड़ नहीं पाते ।
आधीन रहते है हम तन-मन के, चाहके बेड़ियाँ तोड़ नहीं पाते ।
तेरी दास्ताँ स्वीकार करते है, अपनी मनमानी को रोक नहीं पाते ।
समर्पण किया तेरे चरणों में, मुक्त होके जीना सीख नहीं पाये ।
ठोकरें लगती है हर बार, उससे सीख न लेते है हम ।
पश्चाताप के आसूँ बहाते है, वही कर्म हर बार दोहराते है ।
बदलते हुये हमने सबको पाया, खुद बदलना सीख न पाया ।
जज़बात हमारा झूठ हो जाता है, पहने के काबिल ना रहते तेरे सामने ।
उठा-पटक कब तक चलेगी. रहना दिल की मस्ती में कब सीख पायेंगें ।
प्रभु झुँठा हूँगा, पर मेरे भाव सच्चे है ।
कोरी आंखो से न उपजे है आसूं मेरे, दर्दे दिल को जब होता है तब बहते है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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