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Hymn No. 799 | Date: 26-Feb-1999
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नजर जो लड गयी तुझसे, तो नजर न हटा सकते है तुझपे से ।
नजर जो लड गयी तुझसे, तो नजर न हटा सकते है तुझपे से ।
जालिम जो शिकार हुआ तेरे प्यार का, तो दिल भूला सकता है कैसे तुझे ।
मेरी कोई औकात नहीं ये तो प्यार की है ललकार ।
हम तो तेरे चरणो के काबिल न है, बेखयाली में तेरा लब चूम लेता हूँ ।
दोष न है इसमें कोई मेरा, जो बाते भुलाये न भूला जाता हूँ ।
तेरे नजदीक आते ही खुद ब खुद खुद को भूल जाता हूँ ।
तेरे सिवाय किसी को जान नहीं पाता, जब होता है तू करीब ।
ये उजड़ा हुआ चमन गुलजार नजर आने है लगता, जब तू फरमाता है तशरीफ।
सवार है मुझ पे प्यार का भूत, ये खुदा भूला में सब कुछ माफ करना ।
नजर नहीं आता चारों ओर गुलिस्ताँ में मेरे यार के सिवाय ।


- डॉ.संतोष सिंह