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Hymn No. 82 | Date: 10-Feb-1997
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विकल है मेरा मन तेरा नाम लेने को बार – बार,
विकल है मेरा मन तेरा नाम लेने को बार – बार,
विफल हो जाताहूँ, अपने प्रयासों में हर बार ।
अपने मन की कमजोरियों, और तन की संदिग्ध आदतों,
के चलते भटक जाता हूँ, अपने मार्ग से, दूर हो जाता हूँ तुझसे ।
मेरी प्रार्थना हैं तुझसे इतनी, कर ले स्वीकार अपने चरणों में,
ना फर्क पड़ेगा, तुझको कृतार्थ हो जायेगा रोम – रोम मेरा तेरा ।
दल – दल में फंसा ये तन निकलने के प्रयासों में ;
गहरा डुबता जा रहा है अब बस तेरे सहारे की आँस है ।


- डॉ.संतोष सिंह