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Hymn No. 828 | Date: 08-Mar-1999
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दशरथ नंदन, पहनते हो तुम कानन कुंडल ।
दशरथ नंदन, पहनते हो तुम कानन कुंडल ।
कांधे पे धरते हो धनु, चित्त को हरने वाली मुस्कान तुम्हारी ।
सजा देते दुष्टों को, भेजते हुये अपने धाम ।
प्रतीक मर्यादा के तुम, सीख लेते तुमसे ऋषिमुनी ।
अतुल ताकत रहते हुये, सजा कबूल करते पिता की ।
सेवा करते बजरंगी, रंग में रंगते हुये तुम्हारे ।
प्राणों से प्रिय जानकी में, धरा सदा संग तुम्हारा ।
क्या न किया प्रिय के लिये, मर्यादा का धर्म निभाते हुये ।
इस धरा पे कई-कई बार आये, नई राह बताने के लिये ।


- डॉ.संतोष सिंह