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Hymn No. 829 | Date: 08-Mar-1999
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ईश्वर एक होके अनेक है, मार्ग अलग-अलग है तो क्या मंझिल एक है ।
ईश्वर एक होके अनेक है, मार्ग अलग-अलग है तो क्या मंझिल एक है ।
नाम कई हैं, धाम भी अनेक है, रहने वाला परमात्मा चित्त के अनुरूप विराजता है सबमें ।
उसका कोई ओर न छोर है, शुरुआत कही से कर लो पहुँचेंगे तो उसकी और ।
विविधताओं का वो है पुजारी, बिना किसी हिचक के स्वीकार करता है सभी को।
जानते है सब मानता न है कोई, प्यार जिसने किया वोही पहचान लेता है उसको ।
बंधता न कभी किसी से, जिसने मुक्त रखा अपने आपको उसकी तरह, बंध जाता है उससे ।
पहचान वही पुरानी है जो अनेकता में एकता है उसी का है वो दीवाना ।
उस एक का प्यार पाया जिसने, उसीने पहचाना उसके विविध रूपो को ।
श्रद्धा और विश्वास से जन्म होता है प्यार का, प्यार की शक्ति को करता है वो अंगीकार ।
टूटता है उसके आगे जन्मो जन्म का हर दंभ, जिसको ढोता रहता है हमारा मन


- डॉ.संतोष सिंह