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Hymn No. 882 | Date: 26-Mar-1999
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खेल है अजीब जीवन का, कभी तू बहुत दूर कभी करीब आता है नजर ।
खेल है अजीब जीवन का, कभी तू बहुत दूर कभी करीब आता है नजर ।
भेद है हमारे दिलो में जो तुझको पहचान नहीं पाता विभिन्न रूपो में ।
प्यार किया है तुझको बहुत बार, प्यार में नया न पाया एक बार ।
गुस्ताखी माफ करना, अब तक तुझको अपना यार बना न पाया ।
दिल में है भाव बहुत, उनको आकार देना अब तक सीख न पाया ।
कई बार तेरे भाव बहुत, उनको आकार देना अब तक सीख न पाया ।
मुलाकात पे मुलाकात होती गयी, तेरा दीदार करना अब तक सीख न पाया ।
आंसू गवाह न है मेरे टूटने के, वो तो हिम्मत बंधाते है कुछ कर गुजरने की ।
हारना हमने न सीखा है जीवन में, आकार पाया है तेरे हाथों से ।
प्रयास पल दर पल जारी रहेगा, कांटो भरी राहों से आग की बरसात से गुजर कर मुलाकात करेंगे तुझसे ।


- डॉ.संतोष सिंह