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Hymn No. 921 | Date: 04-Apr-1999
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हार जाना चाहता हूँ, तेरे हाथों आज सब कुछ ।
हार जाना चाहता हूँ, तेरे हाथों आज सब कुछ ।

कुर्बानी दे देना चाहता हूँ तेरे चरणों में आज अपनी ।

तेरे-मेरे बीच का, हर भेद मिटा देना चाहता हूं आज मैं ।

तेरे हाथों जीते जी खुद को नीलाम कर देना चाहता हूँ आज मैं ।

दिन हो या रात दूर का सफर तय कर लेना चाहता हूँ आज मैं ।

दीदार करना चाहता हूँ बांधके प्यार के बंधन में ।

जो भी होना हो कल की जगह आज हो जाने दे ।

कल के फेर में पड़के दूर हुआ तुझसे न जाने कितनी बार ।

गुस्ताखी के लिये माफ करना, सजा या प्यार तू आज दे देना ।

विश्वास तुझपे बहुत है, पर खुद पे एतबार न है मुझे ।


- डॉ.संतोष सिंह