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Hymn No. 1005 | Date: 23-Apr-1999
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हे.. कितनी विचित्र बात है, तू है हमारे साथ, खोजते हैं हम तुझे दिन रात ।
हे.. कितनी विचित्र बात है, तू है हमारे साथ, खोजते हैं हम तुझे दिन रात ।
दोष कहाँ है तेरा, जब मन ने न माना तुझको, तो दिल कैसे जानेगा तुझको ।
हाल वही पुराना है आके करीब तेरे, खुदको न बदल पाया ।
कुछ कर पाये न पाये, दुहाई दे बैठे तेरी माया की, मुक्त होना नहीं चाहते अपनी छाया से ।
चाहे जो कुछ भी हो, कमियों से हार मानेंगे नहीं, तेरा साथ यूँ ही पाया नहीं ।
फरियाद करेगे नहीं, हाँ तुझसे दिल की हर बात कहेगे, जो डालती हैं रूकावटे।
पल भर में चूक जाते हैं, अपने किये की सजा पाने पे होश में हम हैं आते ।
तूने सदा से सँवारना चाहा, हम खेल जाते हो अपने आप से ।
जहाँ था मन लगता, अब वो भी रास नहीं आता, तेरे प्यार के आगे ।
मुक्त हो जाना चाहते है, अपने आप से, तेरे कदमो की धूल बनके ।


- डॉ.संतोष सिंह