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Hymn No. 1006 | Date: 23-Apr-1999
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बिगड़ी मेरी बन जाये, कर दे तू कुछ ऐसा ।
बिगड़ी मेरी बन जाये, कर दे तू कुछ ऐसा ।
देता है तू बहुत कुछ, मारते है पैरो पे कुल्हाड़ी खुद ही ।
कई बार सम्भाला तूने हमको, समय रहते संभल न पाया ।
करनी की भरनी पड़ी तो, बार-बार रोके पुकारा तुझे ।
चेते होते पहले तो ये न होता हाल आज हमारा ।
शर्मसार हुये देखके तेरी विशालता, तुझको पहले जैसा पाया ।
गलतफहमी है हमारी कोई खेलता है हमसे, खेलते तो खुद से है ।
सिक्कों के जैसे दो पहलू हैं होते, वैसे हैं हम बाहर-भीतर अलग ।
मिटा दे तू आज हमारे तन-मन की अबूझ हरकतों को ।
शिरकत करना चाहता हूँ तेरी प्यार भरी महफिलों में ।


- डॉ.संतोष सिंह