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Hymn No. 1008 | Date: 23-Apr-1999
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प्यार ही प्यार चाहता हूँ, प्यार के सिवाय कुछ नहीं चाहता ।
प्यार ही प्यार चाहता हूँ, प्यार के सिवाय कुछ नहीं चाहता ।
कमियाँ तो हैं अनेक, दूर करनी होगी तुझे हर एक को ।
सामर्थ्य नहीं है हममें इतनी, पतन होता है इसलिये हर पल हमारा ।
इस दलदल से तू उबार सकता है, तेरी कृपा बरसा के ।
ऐसा कुछ न किया, जो तुझे मजबूर बना दे करने को ।
आज नहीं तो कल होगे परिपक्व, जो तेरी बातो को यूँ ही न जाने देगे ।
इक दिन आयेगी सबलता हममें भी, पाके तेरा अमृतमय आशीष ।
प्यार में बहते-फिरेंगे, आहत न कर पायेगा कोई हमें ।
आज हमने हँसने का मौका दिया है सबको, दोष किसीका न उस में ।
हम भी इक दिन प्यार की अमर कहानी बनके दिखायेंगे सबको ।
- डॉ.संतोष सिंह
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