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Hymn No. 1009 | Date: 23-Apr-1999
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लिखी लीखी न कहता हूँ, अपने दिल का हाल बयाँ करता हूँ ।
लिखी लीखी न कहता हूँ, अपने दिल का हाल बयाँ करता हूँ ।
काबिल नहीं है तेरे, फिर भी प्यार दिया तूने हमको ।
हारके बैठे थे, सहारा पाया तेरे अमृतमय गीतों से ।
आज ख्वाब देखता हूँ जीतने का, विश्वास जगाया है तूने ।
परिचायक है तू विशालता का, अपनाता है सदा एकसा ।
दिल ही दिल में रो पड़ता हूँ तेरा, निश्छल प्यार देखके ।
सदा से तू हरता आया है, हमारे तन-मन के विषय तापको ।
तेरी निगाहों से बरसती है, ममता करुणा जो अहसास कराती अपनेपन का ।
देता आया है तू सदा से, लेना तूने न जाना कभी ।
मिटता रहू कई-कई जन्मों तक तुझपे, हकदार न बन सकता तेरे कदमों का ।
- डॉ.संतोष सिंह
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